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दुआ

जो दुआ आसानी से मुकम्मल नहीं होती, यकीन मानिए वो दुआ बड़ी हसीन होती है.

Bas wahin se iski shuruaat hui

Bas wahin se iski shuruaat hui, jahan teri or meri bat hui... ankhon hi ankhon me dil de baithe or aise hi apni mulakat hui... silsile badhne lage jo baton ke, to khton kii bhi barsat hui... jab khat bhi padne lage kam baton ke tab jakar tujhse mulakat hui... ek chai ek samosa or chand choklate se shuru hua safar milne ka... fir silsila roz milne tak pahucha or har din bar-bar wahi bat hui... ik adat si padne lagi jab ekduje ko jo har wqt bas sath rhne ki... tab naa jane kaise gujre the din or naa jaane kaise har raat hui... ab jo jindagi bitne lagi hai sath tere to ehasas hua un baton ka, mulakton ka... ki har pal hi khubsurat tha apna jo tujhe dekha hamne or tujhse mulakat hui...

बेवजह मोहब्बत.

बेवजह मोहब्बत...बेतहाशा तकरार... खामखां यूं रूठना...खामखां ही प्यार... जंग और इश्क में सबकुछ जायज है... चाहे हो जाए मौत या चाहे ही हो हार... #hiteshsongara

अभी कल ही की तो बात है...

वो हर सुबह जल्दी मां जगा दिया करती थी, कभी हाथ थामकर तो कभी मारकर स्कूल भगा दिया करती थी... हम भी बेमन अपनी पगडंडी पर उस ओर निकल जाया करते थे, शाम को जल्दी वापस घर आना है, खेलने जाना है..सोच में डूब जाता करते थे.... अभी कल ही की तो बात है.... कुछ बड़े हुए स्कूल छोड़ा और कॉलेज की राह पर खुद ही निकल जाया करते थे, मां सुबह तो अब भी जल्दी ही उठाती थी लेकिन अब हम भी उठ जाया करते थे... घर से निकलते कॉलेज जाते और मस्ती में डूबे शाम को नहीं... हां लेकिन रात को घर की ओर निकल ही आया करते थे.... अभी कल ही की तो बात है...

पगली लड़की मेरे साथ रहने को लड़ती है

अक्सर उसके मुंह से एक बात सुनाई देती है, उसके चेहरे पर हंसी में छुपी एक बात दिखाई देती है. वो नाराज भी है मुझसे और प्यार भी करती है, रूठती भी है मुझसे और मुझे मनाने को भी तरसती है. कई बार समय का हवाला देती है और खुद ही उनमें उलझी रहती है, खुद ही फिर संभालती भी है और खुद ही फिर बिगड़ती है. नाराजगी फिर भी वैसी ही रहती है और मनाने को भी तरसती है. चेहरा भी दिखाती है अपना मुझे और छुपाकर भी रखती है, कुछ कहती है फिर चुप रहती है और फिर बिन कहे बहुत कुछ कह देती है. मेरे साथ चार कदम चलने से भी मना करती है, और फिर जीवन भर साथ रहने का दावा करती है. उसकी हंसी उसकी ख़ुशी और उसकी मुस्कान बहुत कुछ कहती है. साथ देने का वादा भी मुझसे करती है और पगली लड़की मेरे साथ रहने को भी लड़ती हैं. 

अब नींद की तलाश नहीं...!!

मुझे अब नींद की तलाश नहीं,  अब रातों को जागना अच्छा लगता है.  मुझे नहीं मालूम की वो मेरी किस्मत में है या नहीं, मगर खुदा से उसे मांगना अच्छा लगता है. जाने मुझे हक़ है या नहीं,  पर उसकी परवाह करना अच्छा लगता है.  उसे प्यार करना सही है या नहीं, पर इस अहसास को जीना अच्छा लगता है. कभी हम साथ होंगे या नहीं, पर ये ख्वाब देखना अच्छा लगता है. वो मेरा है या नहीं, पर उसे अपना कहना अच्छा लगता है. दिल को बहलाऊ बहुत पर मानता ही नहीं, शायद इसे भी उसके लिए धड़कना अच्छा लगता है.

एक सवाल : क्या सचमुच बचपन सुहाना हो चला है ?

कि यूं जो बात करें बीते पल की, देखते हैं कुछ-कुछ छुट सा गया है, वो बचपन जो खिलखिलाता था गलियों में, वो कहीं लुट सा गया है. वो मिटटी के खिलौने थे जिनसे अपना सच्चा घर बनता था, सुना है एक सदी से.....वो घर भी अब टूट गया है. मेरे हाथों में गिल्ली और डंडे होते थे, जेबों में कंचे छलकते थे, कंचे भी गुम हो गए हैं कहीं और गिल्ली डंडा भी अब टूट गया है.   कि यूं जो बात करें बीते पल की, देखते हैं कुछ-कुछ छुट गया है, वो बचपन जो खिलखिलाता था गलियों में, वो कहीं लुट गया है. अब हम कुछ-कुछ स्मार्ट हो चले हैं, बच्चे अब जल्दी बड़े होने लगे हैं, वो गलियों में नहीं खेलते, लेकिन हां वो कंप्यूटर पर खेलने लगे हैं. उन्हें हमारी तरह चोट भी नहीं लगती हैं पैरों और कोहनियों में, सुना है कुर्सी पर बैठ उनका बचपन अब सुहाना होने लगा है. बातें मिटटी के खेल से अब स्मार्टफोन और टीवी में सिमट रही है, मगर मन में एक सवाल...क्या सचमुच बचपन सुहाना हो चला है?

ये जिन्दगी है साहब

ये जिन्दगी है साहब ऐसे ही चलती रहेगी, यहाँ कभी छांव तो कभी धूप भी निकलती ही रहेगी! ये निर्भर आप पर हैं करता कि निकलना है या नहीं, जिन्दगी तो एक झरने की तरह बहती ही रहेगी! कही दिल को दर्द होगा तो कहीं सुकून भी मिलेगा, ये गर जख्म देगी तो उसपर मरहम मलती भी रहेगी! ये जिन्दगी है साहब ऐसे ही चलती रहेगी, यहाँ कभी छांव तो कभी धूप भी निकलती ही रहेगी!

तुम नहीं समझोगे..!!

कैसा लगता है जब तुम कहते हो कि "तुम बस रहने दो?" तुम्हे बताऊँ...खैर रहने दो क्योंकि तुम नहीं समझोगे.. तुम नहीं समझोगे कि क्यों हम बात नहीं कर पाते, तुम नहीं समझोगे कि आखिर क्यों हम मुलाकात नहीं कर पाते... तुमने बस अपनी ही बातें करनी होती हैं मुझसे, मुझे क्या कहना है कभी तो पूछ भी लो मुझसे... मैं भी अपनी बातें बताउंगी तुम्हे...उतने ही प्यार से..वैसे ही अहसास से... मैं चाहती हूं कि बैठूं तुम्हारे पास...अपने कांपते हाथों में लेकर तुम्हारा हाथ... मगर दिल सिसक सा जाता है ऐसे ही अचानक...अमूमन... मेरे जहन में आता है कि कह दूँ तुमसे...लेकिन "तुम नहीं समझोगे" (हितेश सोनगरा)

वो मोहब्बत ही तो थी

वो मोहब्बत ही तो थी,  जो दूर कोने में कड़ी हमपर हंस रही थी. और कह रही थी, बड़ा गुमान था न तुझे, ले चकनाचूर कर दिया मैंने उसे तेरी ही नजरों के सामने!!  

शायद...!!

तुम्हारे लिए मैं ताज ना बनवा पाऊं शायद, लेकिन घर बनाना मुझे आता है... मुझे नहीं आता कैसे बनाते है 56 भोग, पर चाय बनाना मुझे आता है.... हो सकता है महंगी कार में घुमने का सपना शायद सपना ही रह जाए तुम्हारा... लेकिन यकीन रखना मुझपर तुम्हे कभी पैदल ना चलने देना मुझे आता है.... जब गर्मी सताएगी तो शायद एसी की ठंडी हवा ना मिल पाएगी तुम्हे... लेकिन तुम्हे अपने प्यार की छाँव में हमेशा रखना मुझे आता है... हो सकता है हमारे सपनों का आशियाँ चमकते हुई दीवारों से न बना हो... पर जो भी हो उसे खुशियों से भरना और स्वर्ग से सुंदर बनाना मुझे आता है.... मैं वादा करता हूं जिन्दगी के हर मोड़ पर लड़ता भी रहूँगा तुमसे... लेकिन फिर तुम्हारे सामने काम पकड़कर उसी मासूमियत से तुम्हे मनाना भी मुझे आता है... बस मुझे नहीं आता तो तुम्हारे बिना रहना और सांसे लेते रहना... हाँ मुझे नहीं आता तुम्हारे बिना हर सुबह का सपना देखना... ये कहने में शर्म नहीं है आज मुझे कि नहीं आता मुझे... मुझे नहीं आता खुश रहना बिन तुम्हारे....नहीं आता

तेरी बुराइयों को हर अख़बार कहता है, और तूँ मेरे गांव को गँवार कहता है..!!

तेरी बुराइयों को हर अख़बार कहता है, और तूँ मेरे गांव को गँवार कहता है। ऐ शहर मुझे तेरी औक़ात पता है, तूँ बच्ची को भी हुस्न ए बहार कहता है। थक गया है हर शख़्स काम करते करते, तूँ इसे अमीरी का बाज़ार कहता है। गांव चलो वक्त ही वक्त है सबके पास, तेरी सारी फ़ुर्सत तेरा इतवार कहता है। मौन होकर फोन पर सारे रिश्ते निभाए जा रहे हैं, तूँ इस मशीनी दौर को परिवार कहता है। वो मिलने आते थे कलेजा साथ लाते थे, तूँ दस्तूर निभाने को रिस्तेदार कहता है। बड़े-बड़े मसले हल करती थी पंचायते, अंधी भ्रस्ट दलीलों को दरबार कहता है। अब बच्चे तो बड़ों का अदब भूल बैठे हैं, तूँ इसे नये दौर का संस्कार कहता है।

छोटा सा गाँव मेरा पूरा बिग बाजार था...

छोटा सा गाँव मेरा पूरा बिग बाजार था... एक नाई, एक मोची, एक लुहार था... छोटे छोटे घर थे, हर आदमी बड़ा दिलदार था... कही भी रोटी खा लेते, हर घर मे भोजऩ तैयार था.... बाड़ी की सब्जी मजे से खाते थे जिसके आगे शाही पनीर बेकार था... दो मिऩट की मैगी ना, झटपट दलिया तैयार था.... नीम की निम्बोली और शहतुत सदाबहार था.... छोटा सा गाँव मेरा पूरा बिग बाजार था... . अपना घड़ा कस के बजा लेते समारू पूरा संगीतकार था.... मुल्तानी माटी से तालाब में नहा लेते, साबुन और स्विमिंग पूल बेकार था... और फिर कबड्डी खेल लेते, हमे कहाँ क्रिकेट का खुमार था.... दादी की कहानी सुन लेते,कहाँ टेलीविज़न और अखबार था.... भाई -भाई को देख के खुश था, सभी लोगों मे बहुत प्यार था.... छोटा सा गाँव मेरा पूरा बिग बाजार था...!!

माँ तो माँ होती है...!!

ये दुनिया है तेज़ धूप, पर वो तो बस छाँव होती हैं | स्नेह से सजी, ममता से भरी, माँ तो बस माँ होती हैं || हम बच्चों पर बचपन ही से वो लाड-प्यार बरसाती हैं, पापा जब गुस्सा करते हैं तो वो उनसे भी लड़ जाती हैं | चैन से हम सो जाते हैं जब वो पास हमारे होती हैं, स्नेह से सजी, ममता से भरी, माँ तो बस माँ होती हैं || हम सब जब कुछ गलत करें तो वो प्यार से बहुत समझाती हैं, तब भी गर हम ना सुधरें तो वो कस के रपट लगाती हैं | खुद ही मार देने पर वो कोने में जा कर कितना रोती हैं, स्नेह से सजी, ममता से भरी, माँ तो बस माँ होती हैं || माँ से बढ़कर कोई नहीं है इस सारे संसार में, फिर भी हम उनसे दूर हैं होते, एक धोखे से प्यार में | इतने पर भी माँ के चेहरे पर मुस्कान और दुआएं होती हैं, स्नेह से सजी, ममता से भरी, माँ तो बस माँ होती हैं || ये दुनिया है तेज़ धूप, पर वो तो बस छाँव होती हैं | स्नेह से सजी, ममता से भरी, माँ तो बस माँ होती हैं ||