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अभी कल ही की तो बात है...

वो हर सुबह जल्दी मां जगा दिया करती थी, कभी हाथ थामकर तो कभी मारकर स्कूल भगा दिया करती थी... हम भी बेमन अपनी पगडंडी पर उस ओर निकल जाया करते थे, शाम को जल्दी वापस घर आना है, खेलने जाना है..सोच में डूब जाता करते थे.... अभी कल ही की तो बात है.... कुछ बड़े हुए स्कूल छोड़ा और कॉलेज की राह पर खुद ही निकल जाया करते थे, मां सुबह तो अब भी जल्दी ही उठाती थी लेकिन अब हम भी उठ जाया करते थे... घर से निकलते कॉलेज जाते और मस्ती में डूबे शाम को नहीं... हां लेकिन रात को घर की ओर निकल ही आया करते थे.... अभी कल ही की तो बात है...

गहरी बात..!!

बेजुबान पत्थर पे लदे है करोडो के गहने मंदिरो में। उसी दहलीज पे एक रूपये को तरसते नन्हे हाथो को देखा है।। सजे थे छप्पन भोग और मेवे मूरत के आगे। बाहर एक फ़कीर को भूख से तड़प के मरते देखा है।। लदी हुई है रेशमी चादरों से वो हरी मजार। पर बाहर एक बूढ़ी अम्मा को ठंड से ठिठुरते देखा है।। वो दे आया एक लाख गुरद्वारे में हॉल के लिए। घर में उसको 500 रूपये के लिए काम वाली बाई को बदलते देखा है।। सुना है चढ़ा था सलीब पे कोई दुनिया का दर्द मिटाने को। आज चर्च में बेटे की मार से बिलखते माँ बाप को देखा है।। जलाती रही जो अखन्ड ज्योति देसी घी की दिन रात पुजारन। आज उसे प्रसव में कुपोषण के कारण मौत से लड़ते देखा है।। जिसने न दी माँ बाप को भर पेट रोटी कभी जीते जी। आज लगाते उसको भंडारे मरने के बाद देखा है।। दे के समाज की दुहाई ब्याह दिया था  जिस बेटी को जबरन बाप ने। आज पीटते उसी शौहर के हाथो सरे राह देखा है।। मारा गया वो पंडित बे मौत सड़क दुर्घटना में यारो। जिसे खुद को काल, सर्प, तारे और हाथ की लकीरो का माहिर लिखते देखा है।। जिसे घर की एकता की देता था जमाना कभी मिसाल दोस्तों। आज उसी ...

तेरी बुराइयों को हर अख़बार कहता है, और तूँ मेरे गांव को गँवार कहता है..!!

तेरी बुराइयों को हर अख़बार कहता है, और तूँ मेरे गांव को गँवार कहता है। ऐ शहर मुझे तेरी औक़ात पता है, तूँ बच्ची को भी हुस्न ए बहार कहता है। थक गया है हर शख़्स काम करते करते, तूँ इसे अमीरी का बाज़ार कहता है। गांव चलो वक्त ही वक्त है सबके पास, तेरी सारी फ़ुर्सत तेरा इतवार कहता है। मौन होकर फोन पर सारे रिश्ते निभाए जा रहे हैं, तूँ इस मशीनी दौर को परिवार कहता है। वो मिलने आते थे कलेजा साथ लाते थे, तूँ दस्तूर निभाने को रिस्तेदार कहता है। बड़े-बड़े मसले हल करती थी पंचायते, अंधी भ्रस्ट दलीलों को दरबार कहता है। अब बच्चे तो बड़ों का अदब भूल बैठे हैं, तूँ इसे नये दौर का संस्कार कहता है।

जाने क्यूं अब शर्म से, चेहरे गुलाब नही होते

"जाने क्यूं अब शर्म से,  चेहरे गुलाब नही होते। जाने क्यूं अब मस्त मौला मिजाज नही होते। पहले बता दिया करते थे, दिल की बातें। जाने क्यूं अब चेहरे,  खुली किताब नही होते। सुना है बिन कहे  दिल की बात  समझ लेते थे। गले लगते ही दोस्त हालात  समझ लेते थे। तब ना फेस बुक  ना स्मार्ट मोबाइल था ना फेसबुक ना ट्विटर अकाउंट था एक चिट्टी से ही दिलों के जज्बात  समझ लेते थे। सोचता हूं हम कहां से कहां आ गये, प्रेक्टीकली सोचते सोचते भावनाओं को खा गये। अब भाई भाई से समस्या का समाधान  कहां पूछता है अब बेटा बाप से उलझनों का निदान  कहां पूछता है बेटी नही पूछती मां से गृहस्थी के सलीके अब कौन गुरु के  चरणों में बैठकर ज्ञान की परिभाषा सीखे। परियों की बातें अब किसे भाती है अपनो की याद अब किसे रुलाती है अब कौन  गरीब को सखा बताता है अब कहां  कृष्ण सुदामा को गले लगाता है जिन्दगी मे हम प्रेक्टिकल हो गये है मशीन बन गये है सब इंसान जाने कहां खो गये है! इंसान जाने कहां खो गये है....!