कैसा लगता है जब तुम कहते हो कि "तुम बस रहने दो?" तुम्हे बताऊँ...खैर रहने दो क्योंकि तुम नहीं समझोगे.. तुम नहीं समझोगे कि क्यों हम बात नहीं कर पाते, तुम नहीं समझोगे कि आखिर क्यों हम मुलाकात नहीं कर पाते... तुमने बस अपनी ही बातें करनी होती हैं मुझसे, मुझे क्या कहना है कभी तो पूछ भी लो मुझसे... मैं भी अपनी बातें बताउंगी तुम्हे...उतने ही प्यार से..वैसे ही अहसास से... मैं चाहती हूं कि बैठूं तुम्हारे पास...अपने कांपते हाथों में लेकर तुम्हारा हाथ... मगर दिल सिसक सा जाता है ऐसे ही अचानक...अमूमन... मेरे जहन में आता है कि कह दूँ तुमसे...लेकिन "तुम नहीं समझोगे" (हितेश सोनगरा)
आसमान का मौसम बदला बिखर गई चहुँओर पतंग। इंद्रधनुष जैसी सतरंगी नील गगन की मोर पतंग।। मुक्त भाव से उड़ती ऊपर लगती है चितचोर पतंग। बाग तोड़कर, नील गगन में करती है घुड़दौड़ पतंग।। पटियल, मंगियल और तिरंगा चप, लट्ठा, त्रिकोण पतंग। दुबली-पतली सी काया पर लेती सबसे होड़ पतंग।। कटी डोर, उड़ चली गगन में बंधन सारे तोड़ पतंग। लहराती-बलखाती जाती कहाँ न जाने छोर पतंग।।
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