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अब नींद की तलाश नहीं...!!

मुझे अब नींद की तलाश नहीं,  अब रातों को जागना अच्छा लगता है.  मुझे नहीं मालूम की वो मेरी किस्मत में है या नहीं, मगर खुदा से उसे मांगना अच्छा लगता है. जाने मुझे हक़ है या नहीं,  पर उसकी परवाह करना अच्छा लगता है.  उसे प्यार करना सही है या नहीं, पर इस अहसास को जीना अच्छा लगता है. कभी हम साथ होंगे या नहीं, पर ये ख्वाब देखना अच्छा लगता है. वो मेरा है या नहीं, पर उसे अपना कहना अच्छा लगता है. दिल को बहलाऊ बहुत पर मानता ही नहीं, शायद इसे भी उसके लिए धड़कना अच्छा लगता है.

ये जिन्दगी है साहब

ये जिन्दगी है साहब ऐसे ही चलती रहेगी, यहाँ कभी छांव तो कभी धूप भी निकलती ही रहेगी! ये निर्भर आप पर हैं करता कि निकलना है या नहीं, जिन्दगी तो एक झरने की तरह बहती ही रहेगी! कही दिल को दर्द होगा तो कहीं सुकून भी मिलेगा, ये गर जख्म देगी तो उसपर मरहम मलती भी रहेगी! ये जिन्दगी है साहब ऐसे ही चलती रहेगी, यहाँ कभी छांव तो कभी धूप भी निकलती ही रहेगी!

एक कहानी-बड़ी पुरानी (4)

यार मेरे...दिलदार मेरे...चल आज अपनी कहानी लिखते हैं, कुछ मेरी मैं कहता हूं और चल कुछ तेरी जुबानी लिखते हैं. अभी कल ही की तो बात हैं जब पढ़ाई खत्म कर हम स्कूल से निकले थे, बाहर से काफी शरारती नजर आते थे, मगर अंदर से हम काफी भोले थे. याद है कॉलेज में हमने जब साथ कदम रखा था, कुछ नए यार बनाए थे और कुछ पुराने यारों को जोड़ रखा था. साथ क्लासरूम में पीछे की सीट पर वो गप्पे मारने का कॉम्पिटिशन चलता था, कभी मैं तुझसे हार जाता था तो कभी तू मुझे भी जीतता था. समय बीतता चला गया और कॉलेज को भी छोड़ देने का दिन आ गया, आगे सुनहरे सपने दिखे, मगर फिर भी चेहरे के सामने जैसे अँधेरा छा गया. फिर हम भी उसी भीड़ का एक हिस्सा बनने की तरफ चल निकले, नौकरी के चक्कर में खूब निकले मेरे अरमा, मगर फिर भी कम निकले.

मकर संक्रांति स्पेशल

आसमान का मौसम बदला बिखर गई चहुँओर पतंग। इंद्रधनुष जैसी सतरंगी नील गगन की मोर पतंग।। मुक्त भाव से उड़ती ऊपर लगती है चितचोर पतंग। बाग तोड़कर, नील गगन में करती है घुड़दौड़ पतंग।। पटियल, मंगियल और तिरंगा चप, लट्‍ठा, त्रिकोण पतंग। दुबली-पतली सी काया पर लेती सबसे होड़ पतंग।। कटी डोर, उड़ चली गगन में बंधन सारे तोड़ पतंग। लहराती-बलखाती जाती कहाँ न जाने छोर पतंग।।  

जाने क्यूं अब शर्म से, चेहरे गुलाब नही होते

"जाने क्यूं अब शर्म से,  चेहरे गुलाब नही होते। जाने क्यूं अब मस्त मौला मिजाज नही होते। पहले बता दिया करते थे, दिल की बातें। जाने क्यूं अब चेहरे,  खुली किताब नही होते। सुना है बिन कहे  दिल की बात  समझ लेते थे। गले लगते ही दोस्त हालात  समझ लेते थे। तब ना फेस बुक  ना स्मार्ट मोबाइल था ना फेसबुक ना ट्विटर अकाउंट था एक चिट्टी से ही दिलों के जज्बात  समझ लेते थे। सोचता हूं हम कहां से कहां आ गये, प्रेक्टीकली सोचते सोचते भावनाओं को खा गये। अब भाई भाई से समस्या का समाधान  कहां पूछता है अब बेटा बाप से उलझनों का निदान  कहां पूछता है बेटी नही पूछती मां से गृहस्थी के सलीके अब कौन गुरु के  चरणों में बैठकर ज्ञान की परिभाषा सीखे। परियों की बातें अब किसे भाती है अपनो की याद अब किसे रुलाती है अब कौन  गरीब को सखा बताता है अब कहां  कृष्ण सुदामा को गले लगाता है जिन्दगी मे हम प्रेक्टिकल हो गये है मशीन बन गये है सब इंसान जाने कहां खो गये है! इंसान जाने कहां खो गये है....!

ऐ मेरे स्कूल मुझे जरा फिर से तो बुलाना …

ऐ मेरे स्कूल मुझे जरा फिर से तो बुलाना … कमीज के बटन ऊपर नीचे लगाना वो अपने बाल खुद न काढ पाना पी टी शूज को चाक से चमकाना वो काले जूतों को पैंट से पोछते जाना ऐ मेरे स्कूल मुझे जरा फिर से तो बुलाना … वो बड़े नाखुनो को दांतों से चबाना और लेट आने पे मैदान का चक्कर लगाना वो प्रेयर के समय क्लास में ही रुक जाना पकडे जाने पे पेट दर्द का बहाना बनाना ऐ मेरे स्कूल मुझे जरा फिर से तो बुलाना … वो टिन के डिब्बे को फ़ुटबाल बनाना ठोकर मार मार उसे घर तक ले जाना साथी के बैठने से पहले बेंच सरकाना और उसके गिरने पे जोर से खिलखिलाना ऐ मेरे स्कूल मुझे जरा फिर से तो बुलाना … गुस्से में एक-दूसरे की कमीज पे स्याही छिड़काना वो लीक करते पेन को बालो से पोछते जाना बाथरूम में सुतली बम पे अगरबती लगा छुपाना और उसके फटने पे कितना मासूम बन जाना ऐ मेरे स्कूल मुझे जरा फिर से तो बुलाना … वो गेम्स पीरियड के लिए सर को पटाना यूनिट टेस्ट को टालने के लिए उनसे गिडगिडाना जाड़ो में बाहर धूप में क्लास लगवाना और उनसे घर-परिवार के किस्स...

माँ तो माँ होती है...!!

ये दुनिया है तेज़ धूप, पर वो तो बस छाँव होती हैं | स्नेह से सजी, ममता से भरी, माँ तो बस माँ होती हैं || हम बच्चों पर बचपन ही से वो लाड-प्यार बरसाती हैं, पापा जब गुस्सा करते हैं तो वो उनसे भी लड़ जाती हैं | चैन से हम सो जाते हैं जब वो पास हमारे होती हैं, स्नेह से सजी, ममता से भरी, माँ तो बस माँ होती हैं || हम सब जब कुछ गलत करें तो वो प्यार से बहुत समझाती हैं, तब भी गर हम ना सुधरें तो वो कस के रपट लगाती हैं | खुद ही मार देने पर वो कोने में जा कर कितना रोती हैं, स्नेह से सजी, ममता से भरी, माँ तो बस माँ होती हैं || माँ से बढ़कर कोई नहीं है इस सारे संसार में, फिर भी हम उनसे दूर हैं होते, एक धोखे से प्यार में | इतने पर भी माँ के चेहरे पर मुस्कान और दुआएं होती हैं, स्नेह से सजी, ममता से भरी, माँ तो बस माँ होती हैं || ये दुनिया है तेज़ धूप, पर वो तो बस छाँव होती हैं | स्नेह से सजी, ममता से भरी, माँ तो बस माँ होती हैं ||