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अभी कल ही की तो बात है...

वो हर सुबह जल्दी मां जगा दिया करती थी, कभी हाथ थामकर तो कभी मारकर स्कूल भगा दिया करती थी... हम भी बेमन अपनी पगडंडी पर उस ओर निकल जाया करते थे, शाम को जल्दी वापस घर आना है, खेलने जाना है..सोच में डूब जाता करते थे.... अभी कल ही की तो बात है.... कुछ बड़े हुए स्कूल छोड़ा और कॉलेज की राह पर खुद ही निकल जाया करते थे, मां सुबह तो अब भी जल्दी ही उठाती थी लेकिन अब हम भी उठ जाया करते थे... घर से निकलते कॉलेज जाते और मस्ती में डूबे शाम को नहीं... हां लेकिन रात को घर की ओर निकल ही आया करते थे.... अभी कल ही की तो बात है...

अब नींद की तलाश नहीं...!!

मुझे अब नींद की तलाश नहीं,  अब रातों को जागना अच्छा लगता है.  मुझे नहीं मालूम की वो मेरी किस्मत में है या नहीं, मगर खुदा से उसे मांगना अच्छा लगता है. जाने मुझे हक़ है या नहीं,  पर उसकी परवाह करना अच्छा लगता है.  उसे प्यार करना सही है या नहीं, पर इस अहसास को जीना अच्छा लगता है. कभी हम साथ होंगे या नहीं, पर ये ख्वाब देखना अच्छा लगता है. वो मेरा है या नहीं, पर उसे अपना कहना अच्छा लगता है. दिल को बहलाऊ बहुत पर मानता ही नहीं, शायद इसे भी उसके लिए धड़कना अच्छा लगता है.

Job..!!

एक कहानी-बड़ी पुरानी (4)

यार मेरे...दिलदार मेरे...चल आज अपनी कहानी लिखते हैं, कुछ मेरी मैं कहता हूं और चल कुछ तेरी जुबानी लिखते हैं. अभी कल ही की तो बात हैं जब पढ़ाई खत्म कर हम स्कूल से निकले थे, बाहर से काफी शरारती नजर आते थे, मगर अंदर से हम काफी भोले थे. याद है कॉलेज में हमने जब साथ कदम रखा था, कुछ नए यार बनाए थे और कुछ पुराने यारों को जोड़ रखा था. साथ क्लासरूम में पीछे की सीट पर वो गप्पे मारने का कॉम्पिटिशन चलता था, कभी मैं तुझसे हार जाता था तो कभी तू मुझे भी जीतता था. समय बीतता चला गया और कॉलेज को भी छोड़ देने का दिन आ गया, आगे सुनहरे सपने दिखे, मगर फिर भी चेहरे के सामने जैसे अँधेरा छा गया. फिर हम भी उसी भीड़ का एक हिस्सा बनने की तरफ चल निकले, नौकरी के चक्कर में खूब निकले मेरे अरमा, मगर फिर भी कम निकले.

गहरी बात..!!

बेजुबान पत्थर पे लदे है करोडो के गहने मंदिरो में। उसी दहलीज पे एक रूपये को तरसते नन्हे हाथो को देखा है।। सजे थे छप्पन भोग और मेवे मूरत के आगे। बाहर एक फ़कीर को भूख से तड़प के मरते देखा है।। लदी हुई है रेशमी चादरों से वो हरी मजार। पर बाहर एक बूढ़ी अम्मा को ठंड से ठिठुरते देखा है।। वो दे आया एक लाख गुरद्वारे में हॉल के लिए। घर में उसको 500 रूपये के लिए काम वाली बाई को बदलते देखा है।। सुना है चढ़ा था सलीब पे कोई दुनिया का दर्द मिटाने को। आज चर्च में बेटे की मार से बिलखते माँ बाप को देखा है।। जलाती रही जो अखन्ड ज्योति देसी घी की दिन रात पुजारन। आज उसे प्रसव में कुपोषण के कारण मौत से लड़ते देखा है।। जिसने न दी माँ बाप को भर पेट रोटी कभी जीते जी। आज लगाते उसको भंडारे मरने के बाद देखा है।। दे के समाज की दुहाई ब्याह दिया था  जिस बेटी को जबरन बाप ने। आज पीटते उसी शौहर के हाथो सरे राह देखा है।। मारा गया वो पंडित बे मौत सड़क दुर्घटना में यारो। जिसे खुद को काल, सर्प, तारे और हाथ की लकीरो का माहिर लिखते देखा है।। जिसे घर की एकता की देता था जमाना कभी मिसाल दोस्तों। आज उसी ...

हरिवंशराय बच्चन की एक सुंदर कविता...!!

खवाहिश  नही  मुझे  मशहूर  होने  की। आप  मुझे  पहचानते  हो  बस  इतना  ही  काफी  है।  अच्छे  ने  अच्छा  और  बुरे  ने  बुरा  जाना  मुझे। क्यों  कि  जिसकी  जितनी  जरुरत  थी  उसने  उतना  ही  पहचाना  मुझे। ज़िन्दगी  का  फ़लसफ़ा  भी   कितना  अजीब  है,  शामें  कटती  नहीं,  और  साल  गुज़रते  चले  जा  रहे  हैं....!! एक  अजीब  सी  दौड़  है  ये  ज़िन्दगी,  जीत  जाओ  तो  कई  अपने  पीछे  छूट  जाते  हैं, और  हार  जाओ  तो  अपने  ही  पीछे  छोड़  जाते  हैं। बैठ जाता हूं मिट्टी पे अक्सर... क्योंकि मुझे अपनी औकात अच्छी लगती है.. मैंने समंदर से सीखा है जीने का सलीक़ा, चुपचाप से बहना और अपनी मौज में रहना।। ऐसा नहीं है कि मुझमें कोई ऐब ...