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तेरी बुराइयों को हर अख़बार कहता है, और तूँ मेरे गांव को गँवार कहता है..!!

तेरी बुराइयों को हर अख़बार कहता है,
और तूँ मेरे गांव को गँवार कहता है।

ऐ शहर मुझे तेरी औक़ात पता है,
तूँ बच्ची को भी हुस्न ए बहार कहता है।

थक गया है हर शख़्स काम करते करते,
तूँ इसे अमीरी का बाज़ार कहता है।

गांव चलो वक्त ही वक्त है सबके पास,
तेरी सारी फ़ुर्सत तेरा इतवार कहता है।

मौन होकर फोन पर सारे रिश्ते निभाए जा रहे हैं,
तूँ इस मशीनी दौर को परिवार कहता है।

वो मिलने आते थे कलेजा साथ लाते थे,
तूँ दस्तूर निभाने को रिस्तेदार कहता है।

बड़े-बड़े मसले हल करती थी पंचायते,
अंधी भ्रस्ट दलीलों को दरबार कहता है।

अब बच्चे तो बड़ों का अदब भूल बैठे हैं,
तूँ इसे नये दौर का संस्कार कहता है।

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तुम नहीं समझोगे..!!

कैसा लगता है जब तुम कहते हो कि "तुम बस रहने दो?" तुम्हे बताऊँ...खैर रहने दो क्योंकि तुम नहीं समझोगे.. तुम नहीं समझोगे कि क्यों हम बात नहीं कर पाते, तुम नहीं समझोगे कि आखिर क्यों हम मुलाकात नहीं कर पाते... तुमने बस अपनी ही बातें करनी होती हैं मुझसे, मुझे क्या कहना है कभी तो पूछ भी लो मुझसे... मैं भी अपनी बातें बताउंगी तुम्हे...उतने ही प्यार से..वैसे ही अहसास से... मैं चाहती हूं कि बैठूं तुम्हारे पास...अपने कांपते हाथों में लेकर तुम्हारा हाथ... मगर दिल सिसक सा जाता है ऐसे ही अचानक...अमूमन... मेरे जहन में आता है कि कह दूँ तुमसे...लेकिन "तुम नहीं समझोगे" (हितेश सोनगरा)

Mahaan Vyakti

मकर संक्रांति स्पेशल

आसमान का मौसम बदला बिखर गई चहुँओर पतंग। इंद्रधनुष जैसी सतरंगी नील गगन की मोर पतंग।। मुक्त भाव से उड़ती ऊपर लगती है चितचोर पतंग। बाग तोड़कर, नील गगन में करती है घुड़दौड़ पतंग।। पटियल, मंगियल और तिरंगा चप, लट्‍ठा, त्रिकोण पतंग। दुबली-पतली सी काया पर लेती सबसे होड़ पतंग।। कटी डोर, उड़ चली गगन में बंधन सारे तोड़ पतंग। लहराती-बलखाती जाती कहाँ न जाने छोर पतंग।।