Skip to main content

Posts

Showing posts with the label children

अभी कल ही की तो बात है...

वो हर सुबह जल्दी मां जगा दिया करती थी, कभी हाथ थामकर तो कभी मारकर स्कूल भगा दिया करती थी... हम भी बेमन अपनी पगडंडी पर उस ओर निकल जाया करते थे, शाम को जल्दी वापस घर आना है, खेलने जाना है..सोच में डूब जाता करते थे.... अभी कल ही की तो बात है.... कुछ बड़े हुए स्कूल छोड़ा और कॉलेज की राह पर खुद ही निकल जाया करते थे, मां सुबह तो अब भी जल्दी ही उठाती थी लेकिन अब हम भी उठ जाया करते थे... घर से निकलते कॉलेज जाते और मस्ती में डूबे शाम को नहीं... हां लेकिन रात को घर की ओर निकल ही आया करते थे.... अभी कल ही की तो बात है...

एक सवाल : क्या सचमुच बचपन सुहाना हो चला है ?

कि यूं जो बात करें बीते पल की, देखते हैं कुछ-कुछ छुट सा गया है, वो बचपन जो खिलखिलाता था गलियों में, वो कहीं लुट सा गया है. वो मिटटी के खिलौने थे जिनसे अपना सच्चा घर बनता था, सुना है एक सदी से.....वो घर भी अब टूट गया है. मेरे हाथों में गिल्ली और डंडे होते थे, जेबों में कंचे छलकते थे, कंचे भी गुम हो गए हैं कहीं और गिल्ली डंडा भी अब टूट गया है.   कि यूं जो बात करें बीते पल की, देखते हैं कुछ-कुछ छुट गया है, वो बचपन जो खिलखिलाता था गलियों में, वो कहीं लुट गया है. अब हम कुछ-कुछ स्मार्ट हो चले हैं, बच्चे अब जल्दी बड़े होने लगे हैं, वो गलियों में नहीं खेलते, लेकिन हां वो कंप्यूटर पर खेलने लगे हैं. उन्हें हमारी तरह चोट भी नहीं लगती हैं पैरों और कोहनियों में, सुना है कुर्सी पर बैठ उनका बचपन अब सुहाना होने लगा है. बातें मिटटी के खेल से अब स्मार्टफोन और टीवी में सिमट रही है, मगर मन में एक सवाल...क्या सचमुच बचपन सुहाना हो चला है?

हरिवंशराय बच्चन की एक सुंदर कविता...!!

खवाहिश  नही  मुझे  मशहूर  होने  की। आप  मुझे  पहचानते  हो  बस  इतना  ही  काफी  है।  अच्छे  ने  अच्छा  और  बुरे  ने  बुरा  जाना  मुझे। क्यों  कि  जिसकी  जितनी  जरुरत  थी  उसने  उतना  ही  पहचाना  मुझे। ज़िन्दगी  का  फ़लसफ़ा  भी   कितना  अजीब  है,  शामें  कटती  नहीं,  और  साल  गुज़रते  चले  जा  रहे  हैं....!! एक  अजीब  सी  दौड़  है  ये  ज़िन्दगी,  जीत  जाओ  तो  कई  अपने  पीछे  छूट  जाते  हैं, और  हार  जाओ  तो  अपने  ही  पीछे  छोड़  जाते  हैं। बैठ जाता हूं मिट्टी पे अक्सर... क्योंकि मुझे अपनी औकात अच्छी लगती है.. मैंने समंदर से सीखा है जीने का सलीक़ा, चुपचाप से बहना और अपनी मौज में रहना।। ऐसा नहीं है कि मुझमें कोई ऐब ...

ऐ मेरे स्कूल मुझे जरा फिर से तो बुलाना …

ऐ मेरे स्कूल मुझे जरा फिर से तो बुलाना … कमीज के बटन ऊपर नीचे लगाना वो अपने बाल खुद न काढ पाना पी टी शूज को चाक से चमकाना वो काले जूतों को पैंट से पोछते जाना ऐ मेरे स्कूल मुझे जरा फिर से तो बुलाना … वो बड़े नाखुनो को दांतों से चबाना और लेट आने पे मैदान का चक्कर लगाना वो प्रेयर के समय क्लास में ही रुक जाना पकडे जाने पे पेट दर्द का बहाना बनाना ऐ मेरे स्कूल मुझे जरा फिर से तो बुलाना … वो टिन के डिब्बे को फ़ुटबाल बनाना ठोकर मार मार उसे घर तक ले जाना साथी के बैठने से पहले बेंच सरकाना और उसके गिरने पे जोर से खिलखिलाना ऐ मेरे स्कूल मुझे जरा फिर से तो बुलाना … गुस्से में एक-दूसरे की कमीज पे स्याही छिड़काना वो लीक करते पेन को बालो से पोछते जाना बाथरूम में सुतली बम पे अगरबती लगा छुपाना और उसके फटने पे कितना मासूम बन जाना ऐ मेरे स्कूल मुझे जरा फिर से तो बुलाना … वो गेम्स पीरियड के लिए सर को पटाना यूनिट टेस्ट को टालने के लिए उनसे गिडगिडाना जाड़ो में बाहर धूप में क्लास लगवाना और उनसे घर-परिवार के किस्स...

माँ तो माँ होती है...!!

ये दुनिया है तेज़ धूप, पर वो तो बस छाँव होती हैं | स्नेह से सजी, ममता से भरी, माँ तो बस माँ होती हैं || हम बच्चों पर बचपन ही से वो लाड-प्यार बरसाती हैं, पापा जब गुस्सा करते हैं तो वो उनसे भी लड़ जाती हैं | चैन से हम सो जाते हैं जब वो पास हमारे होती हैं, स्नेह से सजी, ममता से भरी, माँ तो बस माँ होती हैं || हम सब जब कुछ गलत करें तो वो प्यार से बहुत समझाती हैं, तब भी गर हम ना सुधरें तो वो कस के रपट लगाती हैं | खुद ही मार देने पर वो कोने में जा कर कितना रोती हैं, स्नेह से सजी, ममता से भरी, माँ तो बस माँ होती हैं || माँ से बढ़कर कोई नहीं है इस सारे संसार में, फिर भी हम उनसे दूर हैं होते, एक धोखे से प्यार में | इतने पर भी माँ के चेहरे पर मुस्कान और दुआएं होती हैं, स्नेह से सजी, ममता से भरी, माँ तो बस माँ होती हैं || ये दुनिया है तेज़ धूप, पर वो तो बस छाँव होती हैं | स्नेह से सजी, ममता से भरी, माँ तो बस माँ होती हैं ||