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क्या लिखू...??

क्या लिखू...??

क्या लिखू उसके बारे में कि वो चाहत है मेरी, वो इबादत है मेरी..
वही तो एक है जो दुआ में भी शामिल है और साथ ही इनायत है मेरी..

क्या लिखू कि उसके होने से एक अलग सा अहसास होता है...
और वो पास न हो तो जैसे हर एक लम्हा उदास होता है..

वो हमेशा कहती है मुझसे कि तुम नहीं करते हो मेरी परवाह, तुम्हे नहीं है मुझसे प्यार..!!

अब क्या लिखू उसको लेकर कि वही है एक जिसे पाने के लिए में जिए जा रहा हूँ,
इश्क़ में इस जुदाई के जहर को पिए जा रहा हूँ..

उसके ना होने के बारे में सोचूँ भी तो रूह काँप जाती है..
एक दर सा लगता है इस दिल में और पलके भीग जाती है..

उसके होने के अहसास भर से इस चेहरे पर मुस्कान बिखते रहती है..
और वो कहती है कि तुम्हे मेरी परवाह नहीं रहती है..

क्या लिखू कि वो जान है मेरी, इस सीने में उसके ही नाम की धड़कन बसी है..
पगली है वो ये भी नहीं जानती है कि कितने खूबसूरत है वो पल जिनमे वो मेरे साथ हँसी है..

उसकी एक मुस्कान के लिए तो मैं इस दुनिया से लड़ जाने का हौसला रखता हूँ..
प्यार बहुत करता हूँ उससे लेकिन ना जाने क्यों हमेशा इसे जताने से डरता हूँ..

आँखों में हमेशा रहता है उसका ही इन्तेजार और चेहरे पर हमेशा ही उसके लिए एक हँसी रहती है..
और वो पगली मुझसे अब भी कहती है कि तुम्हे तो मेरी फ़िक्र ही नहीं रहती है..

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जाकिर खान साहब की कविता : मैं शून्य पे सवार हूँ बेअदब सा मैं खुमार हूँ अब मुश्किलों से क्या डरूं मैं खुद कहर हज़ार हूँ मैं शून्य पे सवार हूँ मैं शून्य पे सवार हूँ उंच-नीच से परे मजाल आँख में भरे मैं लड़ रहा हूँ रात से मशाल हाथ में लिए न सूर्य मेरे साथ है तो क्या नयी ये बात है वो शाम होता ढल गया वो रात से था डर गया मैं जुगनुओं का यार हूँ मैं शून्य पे सवार हूँ मैं शून्य पे सवार हूँ भावनाएं मर चुकीं संवेदनाएं खत्म हैं अब दर्द से क्या डरूं ज़िन्दगी ही ज़ख्म है मैं बीच रह की मात हूँ बेजान-स्याह रात हूँ मैं काली का श्रृंगार हूँ मैं शून्य पे सवार हूँ मैं शून्य पे सवार हूँ हूँ राम का सा तेज मैं लंकापति सा ज्ञान हूँ किस की करूं आराधना सब से जो मैं महान हूँ ब्रह्माण्ड का मैं सार हूँ मैं जल-प्रवाह निहार हूँ मैं शून्य पे सवार हूँ मैं शून्य पे सवार हूँ

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