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पगली लड़की मेरे साथ रहने को लड़ती है

अक्सर उसके मुंह से एक बात सुनाई देती है, उसके चेहरे पर हंसी में छुपी एक बात दिखाई देती है. वो नाराज भी है मुझसे और प्यार भी करती है, रूठती भी है मुझसे और मुझे मनाने को भी तरसती है. कई बार समय का हवाला देती है और खुद ही उनमें उलझी रहती है, खुद ही फिर संभालती भी है और खुद ही फिर बिगड़ती है. नाराजगी फिर भी वैसी ही रहती है और मनाने को भी तरसती है. चेहरा भी दिखाती है अपना मुझे और छुपाकर भी रखती है, कुछ कहती है फिर चुप रहती है और फिर बिन कहे बहुत कुछ कह देती है. मेरे साथ चार कदम चलने से भी मना करती है, और फिर जीवन भर साथ रहने का दावा करती है. उसकी हंसी उसकी ख़ुशी और उसकी मुस्कान बहुत कुछ कहती है. साथ देने का वादा भी मुझसे करती है और पगली लड़की मेरे साथ रहने को भी लड़ती हैं. 

अब नींद की तलाश नहीं...!!

मुझे अब नींद की तलाश नहीं,  अब रातों को जागना अच्छा लगता है.  मुझे नहीं मालूम की वो मेरी किस्मत में है या नहीं, मगर खुदा से उसे मांगना अच्छा लगता है. जाने मुझे हक़ है या नहीं,  पर उसकी परवाह करना अच्छा लगता है.  उसे प्यार करना सही है या नहीं, पर इस अहसास को जीना अच्छा लगता है. कभी हम साथ होंगे या नहीं, पर ये ख्वाब देखना अच्छा लगता है. वो मेरा है या नहीं, पर उसे अपना कहना अच्छा लगता है. दिल को बहलाऊ बहुत पर मानता ही नहीं, शायद इसे भी उसके लिए धड़कना अच्छा लगता है.

बीते कुछ दिनों से उदास है जिंदगी।।

बीते कुछ दिनों से कुछ उदास है जिंदगी, कल तक थी उसके पास और आज फिर अपने पास है जिंदगी। वैसे तो उसके जाने का अफसोस भी कम नहीं, पर उसके लौट के ना आने से तार-तार है जिंदगी। इंतजार उस शख्स का कैसे ना होता, जिसके हर पल में अहसास था कि तुम ही हो जिंदगी। पर आज जब वो पलट कर अपने पास ना आया, तब कहीं मन ने एक सच जाना कि कुछ ऐसी ही होती है जिंदगी। उसे तेरा होना होता, तेरे पास आना होता तो आ चुका होता, जो ना आया तो समझ आया शायद इसी का नाम है जिंदगी।

एक सवाल : क्या सचमुच बचपन सुहाना हो चला है ?

कि यूं जो बात करें बीते पल की, देखते हैं कुछ-कुछ छुट सा गया है, वो बचपन जो खिलखिलाता था गलियों में, वो कहीं लुट सा गया है. वो मिटटी के खिलौने थे जिनसे अपना सच्चा घर बनता था, सुना है एक सदी से.....वो घर भी अब टूट गया है. मेरे हाथों में गिल्ली और डंडे होते थे, जेबों में कंचे छलकते थे, कंचे भी गुम हो गए हैं कहीं और गिल्ली डंडा भी अब टूट गया है.   कि यूं जो बात करें बीते पल की, देखते हैं कुछ-कुछ छुट गया है, वो बचपन जो खिलखिलाता था गलियों में, वो कहीं लुट गया है. अब हम कुछ-कुछ स्मार्ट हो चले हैं, बच्चे अब जल्दी बड़े होने लगे हैं, वो गलियों में नहीं खेलते, लेकिन हां वो कंप्यूटर पर खेलने लगे हैं. उन्हें हमारी तरह चोट भी नहीं लगती हैं पैरों और कोहनियों में, सुना है कुर्सी पर बैठ उनका बचपन अब सुहाना होने लगा है. बातें मिटटी के खेल से अब स्मार्टफोन और टीवी में सिमट रही है, मगर मन में एक सवाल...क्या सचमुच बचपन सुहाना हो चला है?

Is In Me

There is always a part of yours is in me, always a deep thought of yous is in me, all the breath of yours is in me, there is still a body where you live is in me, the smell where love comes is in me... #hiteshsongara

ये जिन्दगी है साहब

ये जिन्दगी है साहब ऐसे ही चलती रहेगी, यहाँ कभी छांव तो कभी धूप भी निकलती ही रहेगी! ये निर्भर आप पर हैं करता कि निकलना है या नहीं, जिन्दगी तो एक झरने की तरह बहती ही रहेगी! कही दिल को दर्द होगा तो कहीं सुकून भी मिलेगा, ये गर जख्म देगी तो उसपर मरहम मलती भी रहेगी! ये जिन्दगी है साहब ऐसे ही चलती रहेगी, यहाँ कभी छांव तो कभी धूप भी निकलती ही रहेगी!