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एक कहानी-बड़ी पुरानी (4)

यार मेरे...दिलदार मेरे...चल आज अपनी कहानी लिखते हैं,
कुछ मेरी मैं कहता हूं और चल कुछ तेरी जुबानी लिखते हैं.

अभी कल ही की तो बात हैं जब पढ़ाई खत्म कर हम स्कूल से निकले थे,
बाहर से काफी शरारती नजर आते थे, मगर अंदर से हम काफी भोले थे.

याद है कॉलेज में हमने जब साथ कदम रखा था,
कुछ नए यार बनाए थे और कुछ पुराने यारों को जोड़ रखा था.

साथ क्लासरूम में पीछे की सीट पर वो गप्पे मारने का कॉम्पिटिशन चलता था,
कभी मैं तुझसे हार जाता था तो कभी तू मुझे भी जीतता था.

समय बीतता चला गया और कॉलेज को भी छोड़ देने का दिन आ गया,
आगे सुनहरे सपने दिखे, मगर फिर भी चेहरे के सामने जैसे अँधेरा छा गया.

फिर हम भी उसी भीड़ का एक हिस्सा बनने की तरफ चल निकले,
नौकरी के चक्कर में खूब निकले मेरे अरमा, मगर फिर भी कम निकले.

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कैसा लगता है जब तुम कहते हो कि "तुम बस रहने दो?" तुम्हे बताऊँ...खैर रहने दो क्योंकि तुम नहीं समझोगे.. तुम नहीं समझोगे कि क्यों हम बात नहीं कर पाते, तुम नहीं समझोगे कि आखिर क्यों हम मुलाकात नहीं कर पाते... तुमने बस अपनी ही बातें करनी होती हैं मुझसे, मुझे क्या कहना है कभी तो पूछ भी लो मुझसे... मैं भी अपनी बातें बताउंगी तुम्हे...उतने ही प्यार से..वैसे ही अहसास से... मैं चाहती हूं कि बैठूं तुम्हारे पास...अपने कांपते हाथों में लेकर तुम्हारा हाथ... मगर दिल सिसक सा जाता है ऐसे ही अचानक...अमूमन... मेरे जहन में आता है कि कह दूँ तुमसे...लेकिन "तुम नहीं समझोगे" (हितेश सोनगरा)

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